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Akbar Birbal Short Stories in Hindi (अकबर बीरबल की कहानी)
आज व्यक्ति की जिन्दगी इतनी व्यस्त हो चुकी है कि हंसने-मुस्कराने की बात तो वह भूल ही चुका है। टी. वी. आदि के ऊबा देने वाले कार्यक्रमों के प्रति भी वह उदासीन हो चुका है और चाहता है कि कुछ नया मनोंरंजन मिले जो लीक से हटकर हो। अपने ऐसे ही उदासीन पाठकों के लिए हम यहां अकबर-बीरबल की नोकझोंक (Akbar Birbal Short Stories in Hindi)की कहानियों का संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं।
जरा-सी देरी हमारा बना-बनाया खेल बिगाड़ सकती है
लंदन की चर्चित मिनिस्ट्री में सर एडवर्ड टॉमस निर्माण एवं यातायात मंत्री थे। एक बहुत बड़े निर्माण कार्य को संपन्न कराने के लिए उनके विभाग ने टेंडर निकाले। टेंडर भरने वालों में सर टॉमस का एक सहपाठी भी था। वह टॉमस से मिला। टॉमस ने कहा- 'तुम सारी औपचारिकताएं पूरी कर दो, मैं तुम्हारे टेंडर पास कराने का पूरा प्रयास करूँगा, पर कार्य समय पर पूरा होना चाहिए।'
तन से बढ़कर मन का सौंदर्य है (Short Hindi Story)
महाकाव्य 'मेघदूत' के रचयिता कालिदास 'मूर्ख' नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनका विवाह सुंदर व महान गुणवती विघोतमा से हुआ था। उन महाकवि से राजा विक्रमादित्य ने एक दिन अपने दरबार में पूछा, 'क्या कारण है, आपका शरीर मन और बुद्धी के अनुरूप् नहीं है?' इसके उत्तर में कालिदास ने अगले दिन दरबार में सेवक से दो घड़ों में पीने का पानी लाने को कहा। वह जल से भरा एक स्वर्ण निर्मित घड़ा और दूसरा मिट्टी का घड़ा ले आया। अब महाकवि ने राजा से विनयपूर्वक पूछासंतुलित जीवन से ही चित्त को शांति
अमेरिका के उघोगपपि एंड्रयू कार्नेगी अरबपति थे। ज बवह मरने को थे तो उन्होंने अपने सेक्रेटरी से पूछा - 'देख, तेरा-मेरा जिंदगीभर का साथ है। एक बात मैं बहुत दिनों से पूछना चाहता था। ईश्वर को साक्षी मानकर सच बताओ कि अगर अंत समय परमात्मा तुझसे पूछे कि तू कार्नेगी बनना चाहेगा या सेक्रेटरी, तो तू क्या जवाब देगा?'
'उत्साह' हमें जिंदादिल बनाए रखता है
अमरीका में जीवन बीमा के विक्रय क्षेत्र में सार्वाधिक ख्याति प्राप्त फ्रैंक बैजर अपने व्यवसाय के आरंभिक काल में असफल हो चुके थे और उन्होंने अपने बीमा कंपनी के पद से पद से इस्तीफा देने का निर्णय ले लिया था। एक दिन वे इस्तीफा लेकर कार्यालय पहुंच गए। उस समय प्रबंधक महोदय अपने विक्रेताओं की बैठक को संबोधित कर रहे थे। बैजर प्रबंधक-कक्ष के बाहर प्रतीक्षा करने लगे। अंदर से आवाज आई-'मैं जानता हूं कि
क्रोध द्वारा मनुष्य स्वयं की क्षति करता है
सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट् होते हुए भी महाराजा अंबरीष भौतिक सुखों से परे थे और सतोगुण के प्रतीक माने जाते थे। एक दिन वे एकादशी व्रत का पारण करने को थे कि महर्षि दुर्वास अपने शिष्यों के सहित वहां पहुंच गए। अंबरीष ने उनसे शिष्यों सहित भोजन ग्रहण करने का निमंत्रण दिया, जिसे दुर्वासा ने स्वीकार कर कहा, 'ठीक है राजन्
सत्याचरण का प्रभाव
बात उन दिनों की है जब एक दिन पाटली-पु़त्र नगर में सम्राट् अशोक गंगा नदी के किनारे टहल रहे थे। उनके साथ उनके मंत्रीगण, दरबारी व सैंकड़ों लोग भी थे। नदी अपने पूरे चढ़ाव पर थी। पानी के प्रबल वेग को देखते हुए सम्राट ने पूछा- 'क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो इस प्रबल गंगा का बहाव उल्टा कर सके?' यह सुनकर सब मौन हो गए। उस जनसमूह से कुछ दूरी पर बिंदुमति नामक बूढ़ी वेश्या खड़ी थी। वह सम्राट् के पास आकर बोली- 'महाराज, मैं आपके सत्य-कर्म की गुहार लगाकर यह कर सकती हूं।' सम्राट् ने उसे आज्ञा दे दी।
जीवन से मत भागो, जिओ उद्देश्य के लिए
घटना उन दिनों की है जब इंगलैंड में डॉक्टर एनी बेसेंट अपने वर्तमान जीवन के प्रति निराश थीं और एक सार्थक जीवन जीने की ललक उनके ह्दय में तीव्रता से उठी थी। एक दिन अंधेरी रात्रि सभी परिवारजन गहारी नींद में सोए हुए थे। केवल वही जाग रही थीं और आत्मा की शांति के लिए इतनी बचैन हो उठी कि इस जीवन से भाग जाने का ख्याल मन में लाकर सामने रखी जहर की शीशी लेने के लिए चुपके-से उठीं, लेकिन तभी किसीदिव्य-शक्ति की आवाज ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया – 'क्यों, जीवन से डर गई?गुरू-भक्ति से मन की शुद्धि
नरेन डे (स्वामी विवेकानंद) अपने छात्र-जीवन में आर्थिक विषमता से जूझ रहे थे। एक दिन उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस से कहा-'यदि आप काली माँ से प्रार्थना करेंगे, तो वह मेरे वर्तमान आर्थिक संकट दूर कर देंगी।' रामकृष्णजी बोले- 'नरेन, संकट तुम्हारे हैं, इसलिए तुम स्वयं मंदिर में जाकर काली मां से मांगो, वह अवश्य सुनेगी।' यह कहकर उसे मंदिर में भेज दिया। वहां उसने और कुछ न कहकर 'माँ मुझे भक्ति दो' कहा और फिर गुरू जी के निकट लौट आया। उन्होंने पूछा- 'क्या मांगा?' 'माँ मुझे भक्ति दो' नरेन ने कहा। 'अरे,
तत्वों के उचित संयोजन से बनता है हमारा व्यक्तित्व
एक बार राजा मिलिंद भिक्षु के पास गए। भिक्षु का नाम नागसेन था। राजा ने भिक्षु से पूछा-महाराज एक बात बताइए, आप कहते हैं कि हमारा व्यक्तित्व स्थिर नहीं है। जीव स्वयंमेव कुछ नहीं है, तो फिर जो आपका नाम नागसेन है यह नागसेन कौन है? क्या सिर के बाल नागसेन हैं? भिक्षु ने कहा- ऐसा नहीं है। राजा ने फिर पूछा - क्या ये दांत, मस्तिष्क, मांस आदि नागसेन हैं? भिक्षु ने कहा-नहीं। राजा ने फिर पूछा-
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